Sunday, October 25, 2009

युग की कथा

राम सुनाये सीता जी को युगों युगों की आज कथा
हर युग की अपनी है कहानी ,हर युग की अपनी है व्यथा ।

कहो नाथ वो ,युग कलियुग का ,कैसा होगा
उसमे भी कोई अग्नि परीक्षा ,और भटकता प्रण होगा

बोले राम फ़िर सुनो सिया ,युग कलियुग का ऐसा होगा
बाहर से वो राम सरीखा ,भीतर से रावण होगा ।

स्त्री पुरूष बनके दोस्त ,मदिरा प्याले टकरायेंगे
द्वेष शांत करने को मन का ,मास मदिरा खाएँगे ।

श्वेत कमल भी उस युग में ,दागदार बन जाएगा
इतनी गिर जायेगी मानवता ,बस कुत्ता वफादार बन जाएगा ।

घंटो सोचेंगे मत पिटा ,तब अपना मुख खोलेंगे
निज संतानों के होते ,वो आवारा सडको पर डोलेंगे ।

मशीन रहेंगी दुनिया में ,इंसान कही खो जायेगा
इंसान कही खो जायेगा ......इंसान कही खो जायेगा .......

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